अहमदाबाद साबरमती के किनारे पर स्थित आसाराम आश्रम को लेकर कानूनी लड़ाई अब अंतिम मोड़ पर पहुंच गई है। गुजरात हाईकोर्ट की डबल बेंच ने आश्रम की अपील को खारिज कर दिया है, जिससे इसे किसी भी वक्त तोड़े जाने का रास्ता साफ हो गया है। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सिंगल जज के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें कलेक्टर के जमीन वापस लेने के आदेश को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आश्रम ने न केवल सरकारी शर्तों का उल्लंघन किया, बल्कि साबरमती नदी की जमीन पर भी अवैध कब्जा किया है।

आश्रम ने मांगा था 4 हफ्ते का स्टे

अदालत ने स्पष्ट किया कि नदी की जमीन का नियमितीकरण (Regularization) किसी भी सूरत में नहीं किया जा सकता। आश्रम ने 4 हफ्ते के 'स्टे' की मांग की थी ताकि वे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें। हालांकि, कोर्ट ने शर्त रखी थी कि अगर वे जमीन खाली करने का हलफनामा दें तभी राहत मिलेगी। सरकारी वकील ने कोर्ट को आश्वस्त किया है कि लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 202 के तहत आश्रम को नया नोटिस दिया जाएगा, जिसके बाद जमीन का कब्जा वापस लिया जाएगा।

बता दें कि साबरमती नदी के किनारे स्थित यह आश्रम पिछले 45 वर्षों से अस्तित्व में है। जिला कलेक्टर ने पहले ही आदेश दिया था कि आश्रम ने आवंटन की शर्तों का उल्लंघन किया है, जिसके बाद से यह कानूनी विवाद चल रहा था।

2013 से जेल में है आसाराम

बता दें कि गांधीनगर की एक अदालत ने रेप के एक मामले में आसाराम को जनवरी 2023 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने आसाराम को 2013 में दर्ज एक मामले में दोषी ठहराया था। आसाराम पर आरोप था कि उसने सूरत की रहने वाली एक महिला शिष्या के साथ 2001 से 2006 के बीच कई बार तब दुष्कर्म किया जब वह अहमदाबाद के पास मोटेरा स्थित उसके आश्रम में रह रही थी। वह 2013 में राजस्थान स्थित अपने आश्रम में एक नाबालिग लड़की के साथ रेप के एक अन्य मामले में भी आजीवन कारावास की सजा काट रहा है।

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